
Karnataka कर्नाटक: सरकारी प्री-यूनिवर्सिटी कॉलेजों (पीयूसी) के हजारों छात्र नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत के कई सप्ताह बाद भी मुफ्त पाठ्यपुस्तकों का इंतजार कर रहे हैं। राज्य सरकार ने मई के अंत तक सभी छात्रों को मुफ्त किताबें उपलब्ध कराने की घोषणा की थी, लेकिन अब तक बड़ी संख्या में विद्यार्थियों को पुस्तकें नहीं मिल सकी हैं। इससे सरकारी कॉलेजों में पढ़ने वाले छात्रों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है और शिक्षकों को भी पढ़ाई सुचारु रूप से संचालित करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।
जानकारी के अनुसार, राज्य सरकार ने कक्षा एक से दस तक के विद्यार्थियों के लिए मुफ्त पाठ्यपुस्तकों का वितरण पूरा कर दिया है, लेकिन प्री-यूनिवर्सिटी कॉलेजों के छात्रों तक किताबें समय पर नहीं पहुंच पाई हैं। इसके कारण नए शैक्षणिक वर्ष के शुरू होने के बावजूद कई छात्र बिना किताबों के पढ़ाई करने को मजबूर हैं।
शिक्षकों का कहना है कि कक्षाओं में नियमित पढ़ाई शुरू हो चुकी है, लेकिन अधिकांश छात्रों के पास निर्धारित पाठ्यपुस्तकें नहीं होने से पाठ्यक्रम पूरा कराने में दिक्कत आ रही है। कई विद्यार्थी एक-दूसरे की किताबें साझा कर पढ़ाई कर रहे हैं, जबकि कुछ को नोट्स और फोटोकॉपी के सहारे पढ़ाई करनी पड़ रही है।
ऑल इंडिया डेमोक्रेटिक स्टूडेंट्स ऑर्गनाइजेशन (AIDSO) की कर्नाटक इकाई ने आरोप लगाया है कि राज्य के कई सरकारी पीयू कॉलेजों में अभी तक केवल आंशिक रूप से किताबें पहुंची हैं। संगठन के अनुसार, बेंगलुरु, यादगीर, हसन, तुमकुर, मैसूर, बेल्लारी और रायचूर सहित कम से कम सात जिलों के सरकारी पीयू कॉलेजों में छात्रों को पूरी संख्या में पुस्तकें उपलब्ध नहीं कराई गई हैं। संगठन का दावा है कि जहां किताबें पहुंची भी हैं, वहां उनकी संख्या छात्रों की आवश्यकता के मुकाबले काफी कम है।
एआईडीएसओ का कहना है कि समय पर किताबें नहीं मिलने से विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है और इससे उनकी परीक्षा की तैयारी पर भी असर पड़ सकता है। संगठन ने राज्य सरकार से जल्द से जल्द सभी सरकारी कॉलेजों में पर्याप्त संख्या में पाठ्यपुस्तकें उपलब्ध कराने की मांग की है।
इस मुद्दे पर शिक्षा विशेषज्ञों ने भी चिंता जताई है। विकास शिक्षा विशेषज्ञ प्रोफेसर निरंजनाराध्य वी.पी. का कहना है कि किताबों के वितरण में देरी का सबसे अधिक असर आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के छात्रों पर पड़ेगा। उन्होंने कहा कि निजी स्कूलों या आर्थिक रूप से सक्षम परिवारों के छात्र वैकल्पिक व्यवस्था कर सकते हैं, लेकिन सरकारी कॉलेजों में पढ़ने वाले अधिकांश विद्यार्थी मुफ्त पाठ्यपुस्तकों पर ही निर्भर रहते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, समय पर पाठ्यपुस्तकें उपलब्ध न होने से छात्रों की सीखने की गति धीमी पड़ सकती है। कई विषयों में प्रारंभिक अध्याय पूरे होने के बाद किताबें मिलने पर विद्यार्थियों को पिछला पाठ समझने में अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ेगी। इससे उनके शैक्षणिक प्रदर्शन पर भी असर पड़ने की आशंका है।
छात्रों और अभिभावकों ने भी सरकार से जल्द समाधान निकालने की मांग की है। उनका कहना है कि शैक्षणिक सत्र शुरू होने से पहले ही किताबें उपलब्ध कराई जानी चाहिए थीं, ताकि पढ़ाई बिना किसी बाधा के शुरू हो सके। कई अभिभावकों ने बताया कि आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण वे बाजार से किताबें खरीदने में सक्षम नहीं हैं।
शिक्षा क्षेत्र से जुड़े लोगों का मानना है कि पाठ्यपुस्तकों की समय पर उपलब्धता गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यदि वितरण में लगातार देरी होती है तो इसका असर पूरे शैक्षणिक सत्र पर पड़ सकता है। उन्होंने सरकार से वितरण प्रक्रिया में तेजी लाने और सभी जिलों के सरकारी पीयू कॉलेजों में पर्याप्त संख्या में किताबें पहुंचाने की अपील की है।
फिलहाल हजारों छात्र मुफ्त पाठ्यपुस्तकों की प्रतीक्षा कर रहे हैं। अब सभी की नजर राज्य सरकार पर है कि वह शेष किताबों का वितरण कब तक पूरा करती है, ताकि विद्यार्थियों की पढ़ाई सामान्य रूप से जारी रह सके।





